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बुधवार, 24 जुलाई 2013

श्रावण मास मे करे भगवान शिव का अभिषेक और पूजन

(ज्योतिषाचार्य वागाराम परिहार)
श्रावण मास में पूजा करने से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है। इसमें कोई शंका नही हैं। श्रावण मासारंभ से मासांत तक शिव के दर्शन हेतु श्रद्धालु शिवालय अवश्य जाते है। श्रद्धालुओं में भक्ति भावना भी इसी मास में विशेष जागृत होती हैं। इस शिव पूजन के साथ-साथ उनकी कथा अर्थात् शिव पुराण का भी श्रवण करना चहिए। कई श्रद्धालु इस मास में व्रत रखते है उन्हें व्रत के साथ-साथ अपनी वाणी पर संयम, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य वचन एवं अनैतिक कार्यो से दूर रहना चाहिए। धर्म,कर्म एवं दान के प्रति भी लोगों का विशेष रूझान देख जा सकता हैं।
           भगवान शंकर की विभिन्न फूलों से पूजन करने का भी भिन्न फल मिलता है। शिव पर कुछ पुष्प नहीं चढाने का निर्देश है-
           बन्धुकं केतकीं कुन्दं केसरं कुटजं जयाम्।
           शंकरे नार्पयेद्विद्वान्मालतीं युधिकामपि।।
       अर्थात् शंकर पर बन्धुकं, केतकी, कुन्द,मौलसरी, कोरैया, जयपर्ण, मालती तथा जुही ये पुष्प शंकर पर नहीं चढाए जाते हैं। बेलपत्र, शतपत्र एवं कमलपत्र से पूजन करने से लक्ष्मी कृपा, आक का पुष्प चढानें से मान-सम्मान में वृद्धि होती है। धतुरे के पुष्प चढाने से विष भय एवं ज्वर भय मिटता है कहा भी है-
’’ आक धतुरा चबात फिरे, विष खात शिव तेरे भरोसे। ‘‘  जवा पुष्प से सावन मास में शिव का पूजन करने से शत्रु का नाश होता है तो गंगा जल से अभिषेक करना मोक्ष प्रदाता माना गया है। साधारण जल से अभिषेक भी वर्षा की प्राप्ति करवाता है। दुग्ध मिश्रित जल से अभिषेक करने से आत्मा को सुकुन मिलता है एवं संतान सुख प्राप्त होता है। तो लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने हेतु गन्ने के रस से या गुड मिश्रित जल अभिषेक करना शुभ माना जाता है। मधु या घी या दही से अभिषेक करने पर भी आर्थिक स्थिति मजबूत बनती है। रोगों से ग्रसित जातकों हेतु विशेष रूप से शुक्र से पीडित जातकों हेतु केवल दुध को अर्पित करना चाहिए। सूर्य एवं चंद्र कृत रोगों से मुक्ति हेतु शहद अर्पित करना विशेष विशेष लाभदायक है तो मंगल कृत रोगों से बचाव हेतु गुड मिले जल से अभिषेक करना चाहिए। बृहस्पति की कृपा हेतु हल्दी मिश्रित या दुग्ध मिश्रित जल से अभिषेक करना उतम लाभ की प्राप्ति करता है। आप भी जिस ग्रह की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। उसी ग्रह के अनुसार पूजन सावन मास में अवश्य करें। किसी कामना विशेष हेतु भी आप किसी विशेष प्रयोग को सावन मास में कर शिव कृपा प्राप्त कर सकते है।
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सोमवार, 22 जुलाई 2013

श्रावण मास के सोमवार व्रत

श्रावण मास में भगवान शिवशंकर की पूजा अर्चना का बहुत अधिक महत्व है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में भक्त लोग उनका अनेकों प्रकार से पूजन अभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। वह प्रसन्न होकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं।

श्रावण मास में पूजा करने से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है। इसमें कोई शंका नही हैं। श्रावण मासारंभ से मासांत तक शिव के दर्शन हेतु श्रद्धालु शिवालय अवश्य जाते है। श्रद्धालुओं में भक्ति भावना भी इसी मास में विशेष जागृत होती हैं। इस शिव पूजन के साथ.साथ उनकी कथा अर्थात् शिव पुराण का भी श्रवण करना चहिए। कई श्रद्धालु इस मास में व्रत रखते है उन्हें व्रत के साथ.साथ अपनी वाणी पर संयमए ब्रह्मचर्य का पालनए सत्य वचन एवं अनैतिक कार्यो से दूर रहना चाहिए। धर्मएकर्म एवं दान के प्रति भी लोगों का विशेष रूझान देख जा सकता हैं।

बारह मासों का नामाकरण शुक्ल पूर्णिमा के दिन चंद्र की नक्षत्रगत स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया है। श्रावण मास का नामकरण भी श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र में चंद्र की स्थिति के कारण किया गया है। श्रवण नक्षत्र का स्वामी चंद्र है। वारों में में सोमवार भी इसी आधार पर शिवपूजन हेतु उपयुक्त माना है। श्रद्धालु पूरे मास नही ंतो सोमवार के दिन शिवालय इसी आस्था के कारण जाता है। सावन मास में रूद्राभिषेक करनाए रूद्राक्ष माला धारण करना एवं ओम नमः शिवाय का जाप करना अत्यन्त लाभकारी बनता है। इस मास में सोमवार व्रत तो अधिकांशतया करते है लेकिन अन्य वारों का व्रत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

इस मास के रविवार का व्रत सूर्य व्रतए सोमवार का रोटकए मंगल का मंगलागौरीए बुधवार का बुध व्रतए गुरूवार का बृहण् व्रतए शुक्रवार का जींवतिका व्रत व शनिवार का व्रत हनुमान व्रत कहलाता है। इस प्रकार मास के प्रत्येक वार का व्रत अत्यन्त शुभदायक बनता है। इस मास में स्त्रियां तिथि एवं वारानुसार अलग.अलग व्रत रखती है एवं मासांत में रक्षाबंधन के दिन स्त्रियां अपने भाई को रक्षासुत्र बांधकर अपने जीवन की रक्षा हेतु वचन भी प्राप्त करती हैं। प्रत्येक तिथि के व्रत अनुसार तिथि विशेष के देवता का पूजन भी किया जाता है।
श्रावण मास के समस्त सोमवारों के दिन व्रत लेने से पूरे साल भर के सोमवार व्रत का पुण्य मिलता है। सोमवार के व्रत के दिन प्रातः काल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव पार्वती और नंदी बैल की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रूप में जल, दूध, दही, शहद, घी,चीनी बनाकर भगवान का पूजन किया जाता है।

रात्रिकाल में घी और कपूर सहित धूप की आरती करके शिव महिमा का गुणगान किया जाता है। लगभग श्रावण मास के सभी सोमवारों को यही प्रक्रिया अपनाई जाती है।

सुहागन स्त्रियों को इस दिन व्रत रखने से अखंड सौभाग्य ऐवम पति पुत्र का सुख मिलता है। विद्यार्थियों को सोमवार का व्रत रखने से और शिव मंदिर में जलाभिषेक करने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती हैएपरीक्षा परिणाम अछा रहता है। बेरोजगार और अकर्मण्य जातकों को रोजगार मिलने से मान प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।
सदगृहस्थ नौकरी पेशा या व्यापारी को श्रावण के सोमवार व्रत करने से धन धान्य और लक्ष्मी की वृद्धि होती है। प्रौढ़ तथा वृद्ध जातक अगर सोमवार का व्रत रख सकते हैं तो उन्हें इस लोक और परलोक में सुख सुविधा और आराम मिलता है। सोमवार के व्रत के दिन गंगाजल से स्नान करना और देवालय तथा शिव मंदिर में जल चढ़ाना आज भी उत्तर भारत में कांवड़ परंपरा का सूत्रपात करती हैं।
अविवाहित महिलाएं अनुकूल वर के लिए श्रावण के सोमवार का व्रत धारण कर सकती हैं। सुहागन महिला अपने पति एवं पुत्र की रक्षा के लिएए कुंवारी कन्या इच्छित वर प्राप्ति के लिए एवं अपने भाईए पिता की उन्नति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ व्रत धारण करती हैं। श्रावण व्रत कुल वृद्धि के लिएए लक्ष्मी प्राप्ति के लिएए सम्मान के लिए भी किया जाता है।

इस व्रत में माता पार्वती और शिवजी का पूजन किया जाता है। शिवजी की पूजाण्अराधना में गंगाजल से स्नान और भस्म अर्पण का विशेष महत्त्व है। पूजा में धतूरे के फूलोंए बेलपत्रए धतूरे के फलए सफेद चन्दनए भस्म आदि का प्रयोग अनिवार्य है।

सुबह स्नान कर सफेद वस्त्र धारण कर काम क्रोध आदि का त्याग करें। सुगंधित श्वेत पुष्प लाकर भगवान का पूजन करें। नैवेद्य में अभिष्ट अन्न के बने हुए पदार्थ अर्पण करें।

निम्न मंत्र से संकल्प लें.
   मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्येश्

शिव का ध्यान मंत्र .
श्ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्‌।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्‌॥
इन मंत्रो से पूजा व हवन करें। ऐसा करने से सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं।

1 ऊँ नमः शिवाय
2  ओम नमो दशभुजाय त्रिनेत्राय पन्चवदनाय शूलिने। श्वेतवृषभारुढ़ाय सर्वाभरणभूषिताय। उमादेहार्धस्थाय नमस्ते सर्वमूर्तयेनमः 





रविवार, 21 जुलाई 2013

शिव को प्रिय है श्रावण मास


                                       (ज्योतिषाचार्य वागाराम परिहार)
         श्रावण मास में पूजा करने से सभी देवताओं की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है। इसमें कोई शंका नही हैं। श्रावण मासारंभ से मासांत तक शिव के दर्शन हेतु श्रद्धालु शिवालय अवश्य जाते है। श्रद्धालुओं में भक्ति भावना भी इसी मास में विशेष जागृत होती हैं। इस शिव पूजन के साथ-साथ उनकी कथा अर्थात् शिव पुराण का भी श्रवण करना चहिए। कई श्रद्धालु इस मास में व्रत रखते है उन्हें व्रत के साथ-साथ अपनी वाणी पर संयम, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य वचन एवं अनैतिक कार्यो से दूर रहना चाहिए। धर्म,कर्म एवं दान के प्रति भी लोगों का विशेष रूझान देख जा सकता हैं।
           बारह मासों का नामाकरण शुक्ल पूर्णिमा के दिन चंद्र की नक्षत्रगत स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया है। श्रावण मास का नामकरण भी श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र में चंद्र की स्थिति के कारण किया गया है। श्रवण नक्षत्र का स्वामी चंद्र है। वारों में में सोमवार भी इसी आधार पर शिवपूजन हेतु उपयुक्त माना है। श्रद्धालु पूरे मास नही ंतो सोमवार के दिन शिवालय इसी आस्था के कारण जाता है। सावन मास में रूद्राभिषेक करना, रूद्राक्ष माला धारण करना एवं ओम नमः शिवाय का जाप करना अत्यन्त लाभकारी बनता है। इस मास में सोमवार व्रत तो अधिकांशतया करते है लेकिन अन्य वारों का व्रत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस मास के रविवार का व्रत सूर्य व्रत, सोमवार का रोटक, मंगल का मंगलागौरी, बुधवार का बुध व्रत, गुरूवार का बृह. व्रत, शुक्रवार का जींवतिका व्रत व शनिवार का व्रत हनुमान व्रत कहलाता है। इस प्रकार मास के प्रत्येक वार का व्रत अत्यन्त शुभदायक बनता है। इस मास में स्त्रियां तिथि एवं वारानुसार अलग-अलग व्रत रखती है एवं मासांत में रक्षाबंधन के दिन स्त्रियां अपने भाई को रक्षासुत्र बांधकर अपने जीवन की रक्षा हेतु वचन भी प्राप्त करती हैं। प्रत्येक तिथि के व्रत अनुसार तिथि विशेष के देवता का पूजन भी किया जाता है।
           भगवान शंकर की विभिन्न फूलों से पूजन करने का भी भिन्न फल मिलता है। शिव पर कुछ पुष्प नहीं चढाने का निर्देश है-
           बन्धुकं केतकीं कुन्दं केसरं कुटजं जयाम्।
           शंकरे नार्पयेद्विद्वान्मालतीं युधिकामपि।।
       अर्थात् शंकर पर बन्धुकं, केतकी, कुन्द,मौलसरी, कोरैया, जयपर्ण, मालती तथा जुही ये पुष्प शंकर पर नहीं चढाए जाते हैं। बेलपत्र, शतपत्र एवं कमलपत्र से पूजन करने से लक्ष्मी कृपा, आक का पुष्प चढानें से मान-सम्मान में वृद्धि होती है। धतुरे के पुष्प चढाने से विष भय एवं ज्वर भय मिटता है कहा भी है-
’’ आक धतुरा चबात फिरे, विष खात शिव तेरे भरोसे। ‘‘  जवा पुष्प से सावन मास में शिव का पूजन करने से शत्रु का नाश होता है तो गंगा जल से अभिषेक करना मोक्ष प्रदाता माना गया है। साधारण जल से अभिषेक भी वर्षा की प्राप्ति करवाता है। दुग्ध मिश्रित जल से अभिषेक करने से आत्मा को सुकुन मिलता है एवं संतान सुख प्राप्त होता है। तो लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने हेतु गन्ने के रस से या गुड मिश्रित जल अभिषेक करना शुभ माना जाता है। मधु या घी या दही से अभिषेक करने पर भी आर्थिक स्थिति मजबूत बनती है। रोगों से ग्रसित जातकों हेतु विशेष रूप से शुक्र से पीडित जातकों हेतु केवल दुध को अर्पित करना चाहिए। सूर्य एवं चंद्र कृत रोगों से मुक्ति हेतु शहद अर्पित करना विशेष विशेष लाभदायक है तो मंगल कृत रोगों से बचाव हेतु गुड मिले जल से अभिषेक करना चाहिए। बृहस्पति की कृपा हेतु हल्दी मिश्रित या दुग्ध मिश्रित जल से अभिषेक करना उतम लाभ की प्राप्ति करता है। आप भी जिस ग्रह की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं। उसी ग्रह के अनुसार पूजन सावन मास में अवश्य करें। किसी कामना विशेष हेतु भी आप किसी विशेष प्रयोग को सावन मास में कर शिव कृपा प्राप्त कर सकते है।
         शिव रूद्री के पाठ का संकल्प लेकर शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर  ’’ ओम नमः शिवाय ‘‘ का जाप करना चाहिए। शिव रूद्री का एक पाठ करने से बाल ग्रहों की शांति होती है। तीन पाठ से उपद्रवों का शमन, पांच रूद्री पाठ से नवग्रह शांति, सात से अनिष्ट की आशंक, अनावश्यक भय नहीं रहता । नौ रूद्री पाठ करने से सर्व शांति एवं ग्यारह रूद्री पाठ से उच्चाधिकारियों के अनुकूल प्रभाव रहते हैं अर्थात् उनका वशीकरण होता है। नौ रूद्रों से एक महारूद्र तुल्य फल की प्राप्ति होती है। एक महारूद्र से जीवन में शांति, राज्य कृपा, लोगोें का मित्रवत व्यवहार , स्वास्थ्य रक्षा एवं चारों पुरूषार्थो की प्राप्ति होती है। तीन महारूद्र करने से आपकी कोई भी एक मनोकामना भगवान शिव अवश्य पूर्ण करते है। बार-बार कठिन परिश्रम करने के उपरान्त भी यदि प्रतियोगिता में सफलता नहीं मिल रहीं,सरकारी नौकरी की आस छुटती हुई दिखे तो पांच महारूद्र इस सावन मास में किसी विद्वान कर्मकाण्डी से कराए या स्वयं करे आपको शिव शंकर सफलता का द्वार अवश्य दिखाएगें। यदि आप किसी भी प्रकार की आधि-व्याधि से पीडित है तो सावन मास में नौ महारूद्र करना आपके ग्रह दोषों को शांत कर रोगों से मुक्ति की राह अवश्य दिखाएगें। शिव भक्तों एवं श्रद्धालुओं को अवश्य ही सावन मास का लाभ उठाना चाहिए। श्रावण मासांत  पूर्णिमा को उपनयन करना भी अति श्रेष्ठ माना गया है। उसी अवस्था में उपनयन का निषेध बताया गया है जब बृहस्पति या शुक्र अस्त हो। इसके अलावा पूर्णिमा में सभी वेदपाणी उपनयन कर सकते है।यदि आपकी भी कोई कामना है तो भोले के दरबार में आप भी सावन मास में दस्तक अवश्य दे। आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेगें।
                                ।। इति।।

                                                                                      परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
                                                                                      मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
                                                                                      जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766