WIDGEO

नक्षत्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नक्षत्र लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 24 जुलाई 2013

आपकी राषि, नक्षत्र और रोगोपचार



          भारतीय ज्योतिश में राषि एवं नक्षत्र का अपना विषेश महत्त्व है। किसी राषि एवं नक्षत्र के आधार पर रोगों का वर्णन प्राचीन आचार्यो ने किया है। बारह राषियों अर्थात् सत्ताईष नक्षत्रों को अंगों में स्थापित करने पर मानव षरीर की आकृति बनती है। नवग्रहों में चन्द्र सर्वाधिक गतिषील ग्रह है, इसलिये इसका मानव षरीर पर भी सर्वाधिक प्रभाव मान सकते हैं। हमारे षरीर का लगभग 70 प्रतिषत भाग जल है। ज्योतिश में जल का स्वामी चन्द्र को ही माना है, इसलिये भारतीय ज्योतिश में चन्द्र को महत्वपूर्ण स्थान देकर उसका जन्म समय जिस राषि या नक्षत्र में गोचर होता है, वही हमारी जन्मराषि या जन्म नक्षत्र माना जाता है। इस राषि या नक्षत्र के आधार पर जातक को कौन रोग हो सकता है एवं इस रोग से बचाव का सुलभ उपाय क्या होगा, इसकी जानकारी इस अध्याय में दी जा रही है। नक्षत्र के आराध्य अथवा उसके प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करके भी रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है:-
      1 अष्विनी:- वराह ने अष्विनी नक्ष्त्र का घुटने पर अधिकार माना है।  इसके पीडित होने पर बुखार भी   रहता है। यदि आपको घुटने से सम्बन्धित पीडा हो, बुखार आ रहा हो तो आप अपामार्ग की जड धारण करें। इससे आपको रोग की पीडा कम होगी।

      2   भरणी:- भरणी नक्षत्र का अधिकार सिर पर माना गया है। इसके पीडित होने पर पेचिष रोग होता        है। इस प्रकार की पीडा पर अगस्त्य की जड धारण करें।

3 कृतिका:- कृतिका नक्षत्र का अधिकार कमर पर है। इसके पीडित होने पर कब्ज एवं अपच की समस्या होती है। आपका जन्म नक्षत्र यदि कृतिका हो तथा कमर दर्द, कब्ज, अपच की षिकायत हो तो कपास की जड धारण करें।

4 रोहिणी:- रोहिणी नक्षत्र का अधिकार टांगों पर होता है। इसके पीडित होने पर सिरदर्द, प्रलाप, बवासीर जैसे रोग होते है। इस प्रकार की पीडा होने पर अपामार्ग या आंवले की जड धारण करें।

5 मृगषिरा:- मृगषिरा नक्षत्र का अधिकार आँखों पर है। इसके पीडित होने पर रक्त विकार, अपच,एलर्जी जैसे रोग होते है। ऐसी स्थिति में खैर की जड धारण करें।

6 आद्र्रा:- आद्र्रा नक्षत्र का अधिकार बालों पर है। इसके पीडित होने पर मंदाग्नि, वायु विकार तथा आकस्मिक रोग होते हैं। इससे प्रभावित जातकों को ष्यामा तुलसी या पीपल की जड धारण करनी चाहिये।

7 पुनर्वसु:- पुनर्वसु नक्षत्र का अधिकार अंगुलियों पर है। इसके पीडित होने पर हैंजा, सिरदर्द, यकृत रोग होते है। इन जातकों को आक की जड धारण करनी चाहिये। ष्वेतार्क जडी मिले तो सर्वोत्तम हैं।

8 पुश्य:- पुश्य नक्षत्र का अधिकार मुख पर है। स्वादहीनता, उन्माद, ज्वर इसके कारण होते है। इनसे पीडित जातकों को कुषा अथवा बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।

9 आष्लेशा:- आष्लेशा नक्षत्र का अधिकार नाखून पर है। इसके कारण रक्ताल्पता एवं चर्म रोग होते है। इनसे पीडित जातको को पटोल की जड धारण करनी चाहिये।

10 मघा:- मघा नक्षत्र का अधिकार वाणी पर है। वाणी सम्बन्धित दोश, दमा आदि होने पर जातक भृगराज या वट वृक्ष की जड धारण करें।

11 पूर्वाफाल्गुनी:- पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुप्तांग पर है। गुप्त रोग, आँतों में सूजन, कब्ज, षरीर दर्द होने पर कटेली की जड धारण करें।

12 उत्तराफाल्गुनी:- उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुदा, लिंग, गर्भाषय पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित रोग मधुमेह होने पर पटोल जड धारण करें।

13 हस्त:- हस्त नक्षत्र का अधिकार हाथ पर होता है। हाथ में पीडा होने या षरीर में जलदोश अर्थात् जल की कमी, अतिसार होने पर चमेली या जावित्री मूल धारण करें।

14 चित्रा:- चित्रा नक्षत्र का अधिकार माथे पर होता है। सिर सम्बन्धित पीडा, गुर्दे में विकार, दुर्घटना होने पर अनंतमूल या बेल धारण करें।

15 स्वाति:- स्वाति नक्षत्र का अधिकार दाँतों पर है, इसलिये दंत रोग, नेत्र पीडा तथा दीर्घकालीन रोग होने पर अर्जुन  मूल धारण करें।

16 विषाखा:- विषाखा नक्षत्र का अधिकार भुजा पर है। भुजा में विकार, कर्ण पीडा, एपेण्डिसाइटिस होने पर गुंजा मूल धारण करें।

17 अनुराधा नक्षत्र का अधिकार हृदय पर है। हृदय पीडा, नाक के रोग, षरीर दर्द होने पर नागकेषर की जड धारण करें।

18 ज्येश्ठा:- ज्येश्ठा नक्षत्र का अधिकार जीभ व दाँतों पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित पीडा होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।

19 मूल:- मूल नक्षत्र का अधिकार पैर पर है। इसलिये पैरों में पीडा, टी.बी. होने पर मदार की जड धारण करें।

20 पूर्वाशाढा:- पूर्वाशाढा नक्षत्र का अधिकार जांघ, कूल्हों पर होता है। जाँघ एवं कूल्हों में पीडा,  कार्टिलेज की समस्या, पथरी रोग होने पर कपास की जड धारण करें।

21 उतराशाढा:-उतराशाढा नक्षत्र का अधिकार भी जाँघ एवं कूल्हो पर माना है। हड्डी में दर्द, फे्रक्चर होने, वमन आदि होने पर कपास या कटहल की जड धारण करें।

22 श्रवण:- श्रवण नक्षत्र का अधिकार कान पर होता है। इसलिये कर्ण रोग, स्वादहीनता होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।

23 धनिश्ठा:- धनिश्ठा नक्षत्र का अधिकार कमर तथा रीढ की हड्डी पर होता है। कमर दर्द, गठिया आदि होने पर भृंगराज की जड धारण करें।

24 षतभिशा:- षतभिशा नक्षत्र का अधिकार ठोडी पर होता है। पित्ताधिक्य, गठिया रोग होने पर कलंब की जड धारण करें।

25 पूर्वाभाद्रपद:- पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार छाती, फेफडों पर होता हैं। ष्वास सम्बन्धी रोग होने पर आम की जड धारण करें।

26 उतराभाद्रपद:- उतराभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार अस्थि पिंजर पर होता है। हांफने की समस्या होने पर पीपल की जड धारण करें।

27 रेवती:- रेवती नक्षत्र का अधिकार बगल पर होता है। बगल में फोडे-फुंसी या अन्य विकार होने पर महुवे की जड धारण करें।
          जब किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य पीडा हो तो आपको अपने जन्म नक्षत्र के प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करनी चाहिये। यदि आपको अपना जन्म नक्षत्र पता नहीं है तो आपको किस प्रकार की स्वास्थ्य पीडा है तथा वह षरीर के किस अंग से सम्बन्धित है अथवा वह रोग किसके अन्तर्गत आ रहा है, उससे सम्बन्धित वृक्ष की जडी ऊपर बताये अनुसार धारण करें तो आपको अवष्य अनुकूल फल की प्राप्ति होगी।
      आपकी राषि के अनुसार जडी धारण करके भी रोग के प्रकोप को कम कर सकते हैं। आप अपनी राषि अपने नाम के प्रथम अक्षर से जान सकते हैं। इस आधार पर:-
मेश राषि वालों को पित्त विकार, खाज-खुजली, दुर्घटना, मूत्रकृच्छ की समस्या होती है। मेश राषि का स्वामी ग्रह मंगल है। इन्हें अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये।
व्ृाष्चिक राषि वालों को भी उपरोक्त रोगों की ही समस्या होती हैं। इन्हें भी अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये
व्ृाशभ एवं तुला राषि वालों को गुप्त रोग, धातु रोग, षोथ आदि होते हैं। यदि आपकी राषि वृशभ अथवा तुला हो तो आपको सरपोंखा की जड धारण करनी चाहिये।
मिथुन एवं कन्या राषि वालों को चर्म विकार, इंसुलिन की कमी, भ्रांति, स्मुति ह्नास, निमोनिया, त्रिदोश ज्वर होता है। इन्हें विधारा की जड धारण करनी चाहिये।
कर्क राषि वालों को सर्दी-जुकाम, जलोदर, निद्रा, टी.बी. आदि होते हैं। इन्हें खिरनी की जड धारण करनी चाहिये।
सिंह राषि वालों को उदर रोग, हृदय रोग, ज्वर, पित्त सम्बन्धित विकार होते हैं। इन्हें अर्क मूल धारण करनी चाहिये। बेल की जड भी धारण कर सकते हैं।
धनु एवं मीन राषि वालों को अस्थमा, एपेण्डिसाइटिस, यकृत रोग, स्थूलता आदि रोग होते हैं। इन्हें केले की जड धारण करनी चाहिये।
मकर एवं कुंभ राषि वालों को वायु विकार, आंत्र वक्रता, पक्षाघात, दुर्बलता आदि रोग होते हैं। इन्हें बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।
  चन्द्र का कारकत्व जल हैं। इसलिये चन्द्र निर्बल होने पर जल चिकित्सा लाभप्रद सिद्ध होती हैं। हमारे षरीर में लगभग 70 प्रतिषत जल होता है। इसलिये षरीर की अधिकांष क्रियाओं में जल की सहभागिता होती है। जल चिकित्सा से जो वास्तविक रोग है, उसका उपचार तो होता ही है इसके साथ अन्य अंगों की षुद्धि भी होती है। इस कारण षरीर में भविश्य में रोग होने की सम्भावना भी कम होती है। जल एक अच्छा विलायक है। इसमें विभिन्न तत्त्व एवं पदार्थ आसानी से घुल जाते हैं जिससे रोग का उपचार आसानी से हो जाता है। जल चिकित्सा में वाश्प् स्नान, वमन,एनीमा, गीली पट्टी, तैरना, उशाःपान एवं अनेक प्रकार की चिकित्सायें हैं। दैनिक क्रियाओं में भी हम जल का उपयोग करते रहते हैं। लेकिन जब चन्द्र कमजोर एवं पीडित होकर उसकी दषा आये तभी जल के अनुपात में षारीरिक असंतुलन बनता है। हमारे षरीर में स्थित गुर्दे जल तत्त्वों का षुद्धिकरण करते हैं। जल की अधिकता होने पर पसीने के रूप में जल बाहर निकलता है जिससे षरीर का तापमान कम हो जाता है। इसलिये जल सेवन अधिक करने पर जोर दिया जाता है ताकि षरीर स्वस्थ रहे अर्थात् चन्द्र की कमजोरी स्वास्थ्य में बाधक न बने। इस प्रकार हमारे लिये चन्द्र महत्त्वपूर्ण ग्रह बन जाता है।            
                                                                                     ज्योतिषाचार्य वागा राम परिहार
                                                                                      परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
                                                                                      मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
                                                                                      जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766
                                  

रविवार, 21 जुलाई 2013

आपकी राशि, नक्षत्र और रोगोपचार



          भारतीय ज्योतिश में राशि एवं नक्षत्र का अपना विेेशेष महत्त्व है। किसी राशि एवं नक्षत्र के आधार पर रोगों का वर्णन प्राचीन आचार्यो ने किया है। बारह राशियों अर्थात् सत्ताईष नक्षत्रों को अंगों में स्थापित करने पर मानव शरीर की आकृति बनती है। नवग्रहों में चन्द्र सर्वाधिक गतिशिल ग्रह है, इसलिये इसका मानव शरीर पर भी सर्वाधिक प्रभाव मान सकते हैं। हमारे षरीर का लगभग 70 प्रतिषत भाग जल है। ज्योतिश में जल का स्वामी चन्द्र को ही माना है, इसलिये भारतीय ज्योतिश में चन्द्र को महत्वपूर्ण स्थान देकर उसका जन्म समय जिस राषि या नक्षत्र में गोचर होता है, वही हमारी जन्मराषि या जन्म नक्षत्र माना जाता है। इस राषि या नक्षत्र के आधार पर जातक को कौन रोग हो सकता है एवं इस रोग से बचाव का सुलभ उपाय क्या होगा, इसकी जानकारी इस अध्याय में दी जा रही है। नक्षत्र के आराध्य अथवा उसके प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करके भी रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है:-
      1 अष्विनी:- वराह ने अष्विनी नक्ष्त्र का घुटने पर अधिकार माना है।  इसके पीडित होने पर बुखार भी   रहता है। यदि आपको घुटने से सम्बन्धित पीडा हो, बुखार आ रहा हो तो आप अपामार्ग की जड धारण करें। इससे आपको रोग की पीडा कम होगी।
      2   भरणी:- भरणी नक्षत्र का अधिकार सिर पर माना गया है। इसके पीडित होने पर पेचिष रोग होता        है। इस प्रकार की पीडा पर अगस्त्य की जड धारण करें।
3 कृतिका:- कृतिका नक्षत्र का अधिकार कमर पर है। इसके पीडित होने पर कब्ज एवं अपच की समस्या होती है। आपका जन्म नक्षत्र यदि कृतिका हो तथा कमर दर्द, कब्ज, अपच की षिकायत हो तो कपास की जड धारण करें।
4 रोहिणी:- रोहिणी नक्षत्र का अधिकार टांगों पर होता है। इसके पीडित होने पर सिरदर्द, प्रलाप, बवासीर जैसे रोग होते है। इस प्रकार की पीडा होने पर अपामार्ग या आंवले की जड धारण करें।
5 मृगषिरा:- मृगषिरा नक्षत्र का अधिकार आँखों पर है। इसके पीडित होने पर रक्त विकार, अपच,एलर्जी जैसे रोग होते है। ऐसी स्थिति में खैर की जड धारण करें।
6 आद्र्रा:- आद्र्रा नक्षत्र का अधिकार बालों पर है। इसके पीडित होने पर मंदाग्नि, वायु विकार तथा आकस्मिक रोग होते हैं। इससे प्रभावित जातकों को ष्यामा तुलसी या पीपल की जड धारण करनी चाहिये।
7 पुनर्वसु:- पुनर्वसु नक्षत्र का अधिकार अंगुलियों पर है। इसके पीडित होने पर हैंजा, सिरदर्द, यकृत रोग होते है। इन जातकों को आक की जड धारण करनी चाहिये। ष्वेतार्क जडी मिले तो सर्वोत्तम हैं।
8 पुश्य:- पुश्य नक्षत्र का अधिकार मुख पर है। स्वादहीनता, उन्माद, ज्वर इसके कारण होते है। इनसे पीडित जातकों को कुषा अथवा बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।
9 आष्लेशा:- आष्लेशा नक्षत्र का अधिकार नाखून पर है। इसके कारण रक्ताल्पता एवं चर्म रोग होते है। इनसे पीडित जातको को पटोल की जड धारण करनी चाहिये।
10 मघा:- मघा नक्षत्र का अधिकार वाणी पर है। वाणी सम्बन्धित दोश, दमा आदि होने पर जातक भृगराज या वट वृक्ष की जड धारण करें।
11 पूर्वाफाल्गुनी:- पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुप्तांग पर है। गुप्त रोग, आँतों में सूजन, कब्ज, षरीर दर्द होने पर कटेली की जड धारण करें।
12 उत्तराफाल्गुनी:- उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अधिकार गुदा, लिंग, गर्भाषय पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित रोग मधुमेह होने पर पटोल जड धारण करें।
13 हस्त:- हस्त नक्षत्र का अधिकार हाथ पर होता है। हाथ में पीडा होने या षरीर में जलदोश अर्थात् जल की कमी, अतिसार होने पर चमेली या जावित्री मूल धारण करें।
14 चित्रा:- चित्रा नक्षत्र का अधिकार माथे पर होता है। सिर सम्बन्धित पीडा, गुर्दे में विकार, दुर्घटना होने पर अनंतमूल या बेल धारण करें।
15 स्वाति:- स्वाति नक्षत्र का अधिकार दाँतों पर है, इसलिये दंत रोग, नेत्र पीडा तथा दीर्घकालीन रोग होने पर अर्जुन  मूल धारण करें।
16 विषाखा:- विषाखा नक्षत्र का अधिकार भुजा पर है। भुजा में विकार, कर्ण पीडा, एपेण्डिसाइटिस होने पर गुंजा मूल धारण करें।
17 अनुराधा:- अनुराधा नक्षत्र का अधिकार हृदय पर है। हृदय पीडा, नाक के रोग, षरीर दर्द होने पर नागकेषर की जड धारण करें।
18 ज्येश्ठा:- ज्येश्ठा नक्षत्र का अधिकार जीभ व दाँतों पर होता है। इसलिये इनसे सम्बन्धित पीडा होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।
19 मूल:- मूल नक्षत्र का अधिकार पैर पर है। इसलिये पैरों में पीडा, टी.बी. होने पर मदार की जड धारण करें।
20 पूर्वाशाढा:- पूर्वाशाढा नक्षत्र का अधिकार जांघ, कूल्हों पर होता है। जाँघ एवं कूल्हों में पीडा,  कार्टिलेज की समस्या, पथरी रोग होने पर कपास की जड धारण करें।
21 उतराशाढा:-उतराशाढा नक्षत्र का अधिकार भी जाँघ एवं कूल्हो पर माना है। हड्डी में दर्द, फे्रक्चर होने, वमन आदि होने पर कपास या कटहल की जड धारण करें।
22 श्रवण:- श्रवण नक्षत्र का अधिकार कान पर होता है। इसलिये कर्ण रोग, स्वादहीनता होने पर अपामार्ग की जड धारण करें।
23 धनिश्ठा:- धनिश्ठा नक्षत्र का अधिकार कमर तथा रीढ की हड्डी पर होता है। कमर दर्द, गठिया आदि होने पर भृंगराज की जड धारण करें।
24 षतभिशा:- षतभिशा नक्षत्र का अधिकार ठोडी पर होता है। पित्ताधिक्य, गठिया रोग होने पर कलंब की जड धारण करें।
25 पूर्वाभाद्रपद:- पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार छाती, फेफडों पर होता हैं। ष्वास सम्बन्धी रोग होने पर आम की जड धारण करें।
26 उतराभाद्रपद:- उतराभाद्रपद नक्षत्र का अधिकार अस्थि पिंजर पर होता है। हांफने की समस्या होने पर पीपल की जड धारण करें।
27 रेवती:- रेवती नक्षत्र का अधिकार बगल पर होता है। बगल में फोडे-फुंसी या अन्य विकार होने पर महुवे की जड धारण करें।
          जब किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य पीडा हो तो आपको अपने जन्म नक्षत्र के प्रतिनिधि वृक्ष की जडी धारण करनी चाहिये। यदि आपको अपना जन्म नक्षत्र पता नहीं है तो आपको किस प्रकार की स्वास्थ्य पीडा है तथा वह षरीर के किस अंग से सम्बन्धित है अथवा वह रोग किसके अन्तर्गत आ रहा है, उससे सम्बन्धित वृक्ष की जडी ऊपर बताये अनुसार धारण करें तो आपको अवष्य अनुकूल फल की प्राप्ति होगी।
      आपकी राषि के अनुसार जडी धारण करके भी रोग के प्रकोप को कम कर सकते हैं। आप अपनी राषि अपने नाम के प्रथम अक्षर से जान सकते हैं। इस आधार पर:-
मेश राषि वालों को पित्त विकार, खाज-खुजली, दुर्घटना, मूत्रकृच्छ की समस्या होती है। मेश राषि का स्वामी ग्रह मंगल है। इन्हें अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये।
व्ृाष्चिक राषि वालों को भी उपरोक्त रोगों की ही समस्या होती हैं। इन्हें भी अनंतमूल की जड धारण करनी चाहिये
व्ृाशभ एवं तुला राषि वालों को गुप्त रोग, धातु रोग, षोथ आदि होते हैं। यदि आपकी राषि वृशभ अथवा तुला हो तो आपको सरपोंखा की जड धारण करनी चाहिये।
मिथुन एवं कन्या राषि वालों को चर्म विकार, इंसुलिन की कमी, भ्रांति, स्मुति ह्नास, निमोनिया, त्रिदोश ज्वर होता है। इन्हें विधारा की जड धारण करनी चाहिये।
कर्क राषि वालों को सर्दी-जुकाम, जलोदर, निद्रा, टी.बी. आदि होते हैं। इन्हें खिरनी की जड धारण करनी चाहिये।
सिंह राषि वालों को उदर रोग, हृदय रोग, ज्वर, पित्त सम्बन्धित विकार होते हैं। इन्हें अर्क मूल धारण करनी चाहिये। बेल की जड भी धारण कर सकते हैं।
धनु एवं मीन राषि वालों को अस्थमा, एपेण्डिसाइटिस, यकृत रोग, स्थूलता आदि रोग होते हैं। इन्हें केले की जड धारण करनी चाहिये।
मकर एवं कुंभ राषि वालों को वायु विकार, आंत्र वक्रता, पक्षाघात, दुर्बलता आदि रोग होते हैं। इन्हें बिछुआ की जड धारण करनी चाहिये।
  चन्द्र का कारकत्व जल हैं। इसलिये चन्द्र निर्बल होने पर जल चिकित्सा लाभप्रद सिद्ध होती हैं। हमारे षरीर में लगभग 70 प्रतिषत जल होता है। इसलिये षरीर की अधिकांष क्रियाओं में जल की सहभागिता होती है। जल चिकित्सा से जो वास्तविक रोग है, उसका उपचार तो होता ही है इसके साथ अन्य अंगों की षुद्धि भी होती है। इस कारण षरीर में भविश्य में रोग होने की सम्भावना भी कम होती है। जल एक अच्छा विलायक है। इसमें विभिन्न तत्त्व एवं पदार्थ आसानी से घुल जाते हैं जिससे रोग का उपचार आसानी से हो जाता है। जल चिकित्सा में वाश्प् स्नान, वमन,एनीमा, गीली पट्टी, तैरना, उशाःपान एवं अनेक प्रकार की चिकित्सायें हैं। दैनिक क्रियाओं में भी हम जल का उपयोग करते रहते हैं। लेकिन जब चन्द्र कमजोर एवं पीडित होकर उसकी दषा आये तभी जल के अनुपात में षारीरिक असंतुलन बनता है। हमारे षरीर में स्थित गुर्दे जल तत्त्वों का षुद्धिकरण करते हैं। जल की अधिकता होने पर पसीने के रूप में जल बाहर निकलता है जिससे षरीर का तापमान कम हो जाता है। इसलिये जल सेवन अधिक करने पर जोर दिया जाता है ताकि षरीर स्वस्थ रहे अर्थात् चन्द्र की कमजोरी स्वास्थ्य में बाधक न बने। इस प्रकार हमारे लिये चन्द्र महत्त्वपूर्ण ग्रह बन जाता है।            
                                                                                     ज्योतिषाचार्य वागा राम परिहार
                                                                                      परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
                                                                                     मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
                                                                                     जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766
                                   

शनिवार, 20 जुलाई 2013

गण्डमूल नक्षत्र

 गण्डमूल नक्षत्र
अष्विनी, आष्लेशा, मघा, ज्येश्ठा, मूल व रेवती ये 6 नक्षत्र सम्पूर्ण मान के गण्डमूल नक्षत्र कहलाते हैं। इनमे जन्म होने पर अषुभ माना गया है। किस नक्षत्र के किस चरण में जन्म होने पर अषुभ फल किस रूप में प्राप्त होता हैं। इसकी जानकारी प्रस्तुत हैंः-
1 अष्विनी:- अष्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। इसके प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक के पिता को कश्ट की सम्भावना रहती है। जन्म के पष्चात् पिता को कुछ न कुछ चिन्ता अवष्य रहती है।
       द्वितीय चरण में जन्म होने पर सुख की प्राप्ति होती है। जातक को गण्डमूल दोश का प्रभाव नगण्य रहता है। 
      तृतीय चरण में जन्म होने पर जातक को राज्य स्तर पर अच्छे पद की प्राप्ति होती है। जातक का जीवन सुखमय व्यतीत होता है।
       चतुर्थ चरण में जन्म होने पर जातक को राजकीय मान-सम्मान की प्राप्ति होती रहती है। जीवन समृद्ध रहता है।
         अर्थात् अष्विनी के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक को गण्ड का प्रभाव अधिक रहता है। विषेशतया अष्विनी नक्षत्र प्रारम्भ के अर्थात् प्रथम चरण के प्रथम 48 मिनिट का समय विषेश कश्टदायक माना गया है। अष्विनी नक्षत्र यदि रविवार के दिन पड रहा हो तो गण्ड देाश कम हो जाता है।
2 आष्लेशा:- आष्लेशा नक्षत्र में उत्पन्न जातक अपनी सास के लिये कश्टदायक होता है, विषेश रूप से जब प्रथम चरण में जन्म नहीं हो। इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक मानसिक रूप से कमजोर रहते है। इनको व्यावहारिक ज्ञान का अभाव होता है। यदि चन्द्रमा पर पापग्रहों का प्रभाव हो तो पागलपन, उन्माद की सम्भावना बढ जाती है।
      आष्लेशा नक्षत्र के प्रथम चरण में उत्पन्न जातक आर्थिक रूप से सम्पन्न होता हैं। जीवन में धन सम्बन्धी समस्या कम ही रहती है।
      द्वितीय चरण में उत्पन्न जातक को आर्थिक हानि की सम्भावना अधिक रहती है। ऐसे जातकों को किसी प्रकार की जोखिम नहीं उठानी चाहिये। षेयर बाजार, लाॅटरी या अन्य में निवेष करते समय किसी विद्वान ज्योतिशी द्वारा परामर्ष अवष्य लें अन्यथा धन डूबने की आषंका बनती है।
      आष्लेशा के तृतीय चरण में उत्पन्न जातक माता के लिये कश्टकारी होता है। जातक के जन्म के पष्चात् माता का स्वास्थ्य कमजोर बना रहता है।
     चतुर्थ चरण में उत्पन्न जातक पिता के लिये कश्टकारक होते हैं। इसके कारण पिता को जीवन में अनेक परेषानियां उठानी पडती हैं।
      आष्लेशा नक्षत्र की औसत मान 60 घडी के अनुसार किस घडी में जन्म होने पर किस फल की सम्भावना अधिक रहती है, इसका विचार किया गया है। आष्लेशा नक्षत्र के प्रथम पांच घडी में जन्म होने पर उसे उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है। यहाँ एक घडी या घटी का मान 24 मिनट का समझें। छः से बारह घटी में जन्म होने पर पिता को कश्ट, तेरह से चैदह में मातृ कश्ट, पन्द्रह से सत्रह में जन्म होने पर धूर्त व लम्पट, अठटारह से इक्कीस घटी में जन्म होने पर बलवान, तीस से चालीस घटी में जन्म होने पर आत्महत्या करने वाला, इकतालिस से छियालिस घटी में जन्म होने पर बिना किसी प्रयोजन के भागदौड करने वाला, सैतालिस से पचपन में जन्म होने पर तपस्वी व अन्तिम पांच घटी में जन्म होने पर धननाषक होता है।
3 मघा:- मघा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक की माता को कश्ट रहता है। जन्म के पष्चात् माता का स्वास्थ्य कमजोर रहता हैं।
       द्वितीय चरण में जन्म होने पर पिता को कश्ट रहता है। जातक के कारण उसके पिता को हर समय कुछ न कुछ परेषानी बनी रहती है।
      तृतीय चरण में जन्म होने पर जातक का जीवन सुखमय व्यतीत होता है। जातक को जीवन में आवष्यकतानुसार धन प्राप्त होता रहता है।
      चतुर्थ चरण में जन्म होने पर जातक को धन लाभ की सम्भावना अच्छी रहती है। ऐसा जातक उच्च षिक्षा प्राप्त करता है। अपनी बुद्धि एवं विद्या के कारण मान-सम्मान भी प्राप्त होता है।
4 ज्येश्ठा:- ज्येश्ठा नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक के बडे भाई को कश्ट होता है।
       द्वितीय चरण में जन्म होने पर छोटे भाई को कश्ट होता है।
       ज्येश्ठ नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म होने पर माता को एवं चतुर्थ चरण में जन्म होने पर स्वयं को कश्ट होता है।
        यदि रविवार या बुधवार के दिन पडने वाले ज्येश्ठा नक्षत्र को जन्म हो तो कश्ट की सम्भावना कम हो जाती है।
5 मूल:- मूल नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर जातक के पिता को कश्ट होता है। कन्या जातक को चैपाये जानवरों, किसी वाहन से दुर्घटना की सम्भावना रहती है।
         द्वितीय चरण में जातक की माता को कश्ट रहता है। कन्या का जन्म होने पर वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती है।
       तृतीय चरण में जन्म होने पर जातक को आर्थिक रूप से परेषानी उठानी पडती है। कन्या का जन्म होने पर वह पिता के लिये कश्टकारी होती है।
        चतुर्थ चरण में जन्म होने पर जातक सुखी रहता है लेकिन कन्या का जन्म हो तो माता के लिये कश्टकारक हेाती है। चतुर्थ चरण में उत्पन्न जातक या जातिका अपने ससुर के लिये कश्टकारक होती हैं।
         मूल नक्षत्र में उत्पन्न बालक एवं कन्या का घटी अनुसार षुभाषुभ

प्रथम 5 घटी 5 घटी 8 घटी 8 घटी 2 घटी 8 घटी 2 घटी 10 घटी 6 घटी 6 घटी
राज्य प्राप्ति पितृ कश्ट धन हानि कामचोर घात राज्य लाभ अल्पायु सुख व्यर्थ भ्रमण अल्पायु

6 रेवती नक्षत्र:- रेवती नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म होने पर राज्य की तरफ से मान-सम्मान एवं धन-लाभ की प्राप्ति, द्वितीय चरण जन्म होने पर राजकीय सेवा , सुख-षांति, तृतीय चरण में जन्म होने पर धन लाभ, सुख-षांति एवं चतुर्थ चरण में जन्म होने पर अत्यन्त कश्टमय जीवन व्यतीत होता है।
      रेवती नक्षत्र यदि बुधवार या रविवार के दिन पडे एवं उस दिन जन्म हो तो गण्डदोश कम हो जाता है। गण्ड नक्षत्रों में जन्म होने पर कब दोश का प्रभाव रहता है। इसके बारे मे आप इस प्रकार जान सकते हैं:-
1 अष्विनी नक्षत्र रविवार के दिन पडे एवं ज्येश्ठा व रेवती षनिवार या बुधवार को पडे तो गण्डदोश कम होता है।
2 गण्ड नक्षत्र में चन्द्रमा का लग्नेष या षुभग्रह से सम्बन्ध हो।
3 गण्ड नक्षत्र होने पर चन्द्रमा किसी षुभ भाव में हो।
 गण्ड नक्षत्र की षांति सूतक समाप्त होने पर करें। यदि उस समय सम्भव न हो तो पुनः जब नक्षत्र आये तब षांति करें। इसके अतिरिक्त जब सम्भव हो तब षीघ्र ही षांति कर लेनी चाहिये अन्यथा विवाह से पूर्व षांति अवष्य करें।
       जिस गण्ड नक्षत्र में जन्म हो उसके स्वामी ग्रह के मंत्र का जाप करना गण्डदोश षांति में सहायक होता है। बुध एवं केतु के नक्षत्र में जन्म लेने पर गण्डदोश बनता है। इसलिये जीवन में गण्डमूल प्रभाव कम हो, इसके निवारणार्थ गणपति उपासना करनी चाहिये। जातक स्वयं बुध एवं केतु के मंत्रों का जाप कर सकता हैं। इसकी विषिश्ट षांति हेतु किसी कर्मकाण्डी से परामर्ष कर सकते हैं। ब्राह्मण भोजन, गाय का दान, वस्त्र दान आदि जन्म नक्षत्र वाले दिन अपनी सामथ्र्य अनुसार करने पर भी गण्ड प्रभाव कम होता हैं। 
                                                                                      ज्योतिषाचार्य वागा राम परिहार
                                                                                      परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
                                                                                     मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
                                                                                     जिला- सिरोही (राज.) 307512
                                                                                    मो. 9001742766