WIDGEO

विजयादशमी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विजयादशमी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

कैसे मनाए विजयादशमी

परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766,9001846274
Email-pariharastro444@gmail.com


विजयादशमी का पर्व प्राचीन काल से ही पूरे भारत वर्ष मे धुमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व रावण पर राम की विजय के प्रतीक रूप में मुख्यतया मनाया जाता है। इस दिन रावण,मेघनाद व कुंभकर्ण का पुतला बनाकर उन्हे जलाने की परंपरा मुख्य रूप से सर्वत्र प्रचलित है। इस दिन अपराजिता पूजन व शमी पुजन विशेष रूप से कई स्थानो पर किया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जब दशमी नवमी से संयुक्त हो तो अपराजिता देवी का पुजन दशमी को उतर पूर्व दिशा में अपरान्ह के समय विजय एवं कल्याण की कामना के लिए किया जाना चाहिए।
धर्मसिन्धु के अनुसार अपराजिता पूजन के लिए अपरान्ह में गांव के उतर पूर्व की ओर जाकर एक स्वच्छ स्थल को गोबर से लीपना चाहिए। फिर चंदन से आठ कोण दल बनाकर संकल्प करना चाहिए- ’ मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्धयर्थ अपराजिता पूजन करिष्ये। इसके पश्चात उस आकृति के बीच मे अपराजिता का आह्वान करना चाहिए। इसके दाहिने एवं बाये जया एवं विजया का आह्वान करना चाहिए। एवं साथ ही क्रिया शक्ति को नमस्कार एवं उमा को नमस्कार करना चाहिए। इसके पश्चात अपराजितायै नमः जयायै नमः, विजयायै नमः मंत्रो के साथ षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात यह प्रार्थना करनी चाहिए। ’ हे देवी, यथाशक्ति मैने जो पुजा अपनी रक्षा के लिए की है। उसे स्वीकार कर आप अपने स्थान को जा सकती है।
इस प्रकार अपराजिता पूजन के पश्चात उतर पूर्व की ओर शमी वृक्ष की तरफ जाकर पुजन करना चाहिए। शमी का अर्थ शत्रुओ का नाश करने वाला होता है। शमी पूजन के लिए इस मंत्र का पाठ करना चाहिए-
प्रार्थना मंत्र-
शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका।
धारिष्यर्जुन बाणानां रामस्य प्रियवादिनी।।
करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया।
तत्र निर्विघ्नकत्र्रीत्वंभव श्रीरामपूजिते।।
अर्थ- शमी पापो का शमन करती है। शमी के कांटे तांबे के रंग के होते है। यह अर्जून के बाणो को धारण करती है। हे शमी,राम ने तुम्हारी पुजा की है। मै यथाकाल विजययात्रा पर निकलुंगा। तुम मेरी इस यात्रा को निर्विघ्न कारक व सुखकारक करो।
इसके पश्चात शमी वृक्ष के नीचे चावल, सुपारी व तांबे का सिक्का रखते है। फिर वृक्ष की प्रदक्षिणा कर उसकी जड के पास की मिट्टी व कुछ पते घर लेकर आते है।
भगवान राम के पूर्वज रघु ने विश्वजीत यज्ञ कर अपनी सम्पूर्ण धन संपति दान कर पर्ण कुटिया में रहने लगे। इसी समय कौत्स को चौदह करोड स्वर्ण मुद्राओ की आवश्यकता गुरू दक्षिणा के लिए पडी। तब रघु ने कुबेर पर आक्रमण कर दिया तब कुबेर ने शमी एवं अश्मंतक पर स्वर्ण मुद्राओ की वर्षा की थी तब से शमी व अश्मंतक की पुजा की जाती है। अश्मंतक के पत्र घर लाकर स्वर्ण मानकर लोगो मे बांटने का रिवाज प्रचलित हुआ।
अश्मंतक पुजा समय निम्न मंत्र बोलना चाहिए-
अश्मंतक महावृक्ष महादोष निवारणम्।
इष्टानां दर्शनं देहि कुरू शत्रुविनाशनम्।।
अर्थात हे अश्मंतक महावृक्ष तुम महादोषो का निवारण करने वाले हो, मुझे मेरे मित्रो का दर्शन कराकर शत्रु का नाश करो। 
इस प्रकार विजयादशमी का पर्व मनाने से सुख समृद्धि प्राप्त होकर विजय की प्राप्ति होती है।
परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766

विजयादशमी का महत्व

विजयादशमी का महत्व 
परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766,09001846274,02972-276626
Email-pariharastro444@gmail.com

भारतीय धर्म शास्त्रो के अनुसार-
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थ सिद्धये।।
अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय विजयकाल रहता है। इसलिए इसे विजयादशमी कहा जाता है।
विजयादशमी का दुसरा नाम दशहरा भी है। भगवान श्री राम की पत्नी सीता को जब अहंकारी एवं अधर्मी रावण अपहरण कर ले गया। तब नारद मुनि के निर्देशानुसार भगवान श्री राम ने नवरात्र व्रत कर नौ दिन भगवती दुर्गा की अर्चना कर प्रसन्न कर वर प्राप्त कर रावण की लंका पर चढाई की। इसी आश्विन शुक्ल दशमी के दिन राम ने रावण का वध कर विजय प्राप्त की थी। तब से इसे विजयादशमी के रूप में मनाया जाने लगा।
भगवान राम के पूर्वज रघु ने विश्वजीत यज्ञ किया था। इस यज्ञ के पश्चात अपनी सम्पूर्ण सम्पति का दान कर एक पर्णकुटिया मे रहने लगे। इस समय रघु के पास कौत्स आया। जिसने रघु से चैदह करोड स्वर्ण मुद्राओ की मांग की। क्योकि कौत्स को गुरू दक्षिणा चुकाने हेतु चैदह करोड स्वर्ण मुद्राओ की आवश्यकता थी। तब रघु ने कुबेर पर आक्रमण कर दिया। इस पर कुबेर ने इसी दिन अश्मंतक व शमी के पौधो पर स्वर्ण मुद्राओ की वर्षा कर दी। जिसे लेकर कौत्स ने गुरू दक्षिणा चुकाई। शेष मुद्राए जनसामान्य ने अपने उपभोग के लिए ली। इसी उपलक्ष्य मे यह पर्व मनाया जाता है।
महाभारत में वर्णन है कि दुर्योधन ने पांडवो को जुएं मे हराकर बारह वर्ष का वनवास दिया था एवं तेरहवा वर्ष अज्ञातकाल का था। इस वर्ष मे यदि कौरव पांडवो को खोज निकालते तो पुनः बारह वर्ष का वनवास व एक वर्ष का अज्ञातवास का सामना करना पडता। इस अज्ञात काल मे पांडवो ने राजा विराट के यहां नौकरी की थी। अर्जून इस काल मे वृहन्नला के वेष मे रह रहा था। जब गौ रक्षा के लिए घृष्टधुम्न ने कौरव सेना पर आक्रमण करने की योजना बनाई तब अर्जून ने शमी वृक्ष से अपने अस्त्र-शस्त्र उतारकर कौरव सेना पर विजय इसी दिन प्राप्त की थी। इसी कारण भी विजयादशमी का पर्व प्रचलित हो गया।
इस प्रकार से देखा जाए तो विजयादशमी का पर्व मुख्यतः विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आश्विन मास के नवरात्र मे देश के अधिकांश भागो मे रामलीला का आयोजन होता है। रामलीला का अन्त रावण दहन के साथ ही हो जाता है। रावण दहन के साथ मेघनाद व कुंभकर्ण के भी पुतले बनाकर जलाए जाते है। गुजरात मे नवरात्र के अवसर पर गरबा नृत्य का आयोजन किया जाता है।
विजयादशमी का पर्व राज परिवार मे सीमा उल्लंघन कर मनाया जाता था। परंतु समय चक्र के साथ राजतांत्रिक व्यवस्था का स्थान लोकतंत्र ने ले लिया। अब यह उत्सव आमजन भी विशेष उत्साह एवं उल्लास के साथ मना रहा है। वास्तव मे यह उत्सव बुराई के अन्त स्वरूप मनाया जाता है। यह पर्व असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है तो अन्याय पर न्याय की जीत,अधर्म पर धर्म की जीत, दुष्कर्मो पर सत्कर्मो की जीत का प्रमुख है। यह पर्व हमे सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। सत्य चाहे कितना भी कडवा हो, हमेशा उसी का अनुसरण करना चाहिए। क्योकि यह सनातन सत्य है कि हमेशा शुभ कर्मो की ही जीत होती है। इसे विजय पर्व भी कहा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र मे इसे अबुझ मुर्हुत की संज्ञा दी गई है। इस दिन किया गया कोई भी कार्य अवश्य सफल रहता है। किसी भी प्रकार के शुभ कर्म के लिए इस पर्व का अवश्य उपयोग करना चाहिए।
परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766